Tuesday, 22 May 2012


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जीवन क्यूँ होता तार-तार ,
फूट रही क्यूँ  कटु  झंकार |
संस्कृति के वक्छ्स्थल पर ,
आधुनिकता का कैसा प्रहार |

मातृत्व रोती जार-जार,
लक्छ्य धूमिल, पथ अल्क्छित,
कर्म विचलित बार-बार |

रूठा शर्म, शील- लज्जा ,
रूठा जीवन का श्रृंगार |
स्वाँस-स्वाँस  सब छूट रहा ,
जीवन का डोर ये टूट रहा |
क्या तेरा , क्या मेरा यहाँ ,
कैसा हैं ये अधिकार |

जीवन क्यूँ होता तार-तार ,
फूट रही क्यूँ कटु  झंकार |

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Sunday, 13 May 2012


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के इन निगाहों में जाने किसकी तलाश हैं ,
न जाने वो दूर है मुझ से या आस-पास हैं ...
या फिर मेरी नज़रों ने उसे पहचाना नही ,
या फिर उसके दिल को भी कुछ अहसास है ...
आजाओं मेरे पास ,सुन कर दिल की आवाज़
तुम बिन अब जिंदगी के हर लम्हें उदास है .
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माँ ......................
तुम जीवन का अहसास हो ,
काँटों से भरे जीवन में ,
तुम खुशियों का अहसास हो..
तुम प्रेम सुधा, निर्मल वसुधा,
तुम स्वासों का उच्छ्वास हो.
मेरे साथ सदा रहने वाली
तुम अन्नंत आकाश हो..
तुम संवेदना की धुरी
तुम सृष्टि का परम विकाश हो ..
तुम करुना की परम मूर्ति ,
तुम जीवन संस्कारों की पूर्ति ,
तुम प्राण वायु इस धरा की,
तुम रूह में चलती स्वास हो..