Tuesday, 4 February 2025

..इस  दौड़ में..

अजब ये रवायत  चली है इस दौड़ में ..
के रश्मे बेमुरव्वत चली है इस दौड़ में  |
शबनम भी अब तिश्नगी में जलते हैं..
अज़ब ये मोहब्बत चली है इस दौड़ में |
तोरते देखा है खुदा की बनायीं रश्मों को ..
के खुदा से भी रकावत चली है इस दौड़ में |
आदमी, आदमी का दुश्मन बना बैठा है ..
ये  कैसी  नफ़रत  चली  है  इस  दौड़  में |
खुदा बनने की खुद चाह किये बैठे  है सब  ..
अपनी-अपनी सब की कुवत चली है इस दौड़ में |
हो चला है अब हर मज़हब खून से लाल यहाँ ..
ये किस खुदा की इबादत चली है इस दौड़ में |

Monday, 3 February 2025

जिंदगी से कुछ

क्या चाहिए मुझे जिंदगी से?
या जिंदगी को मुझ से कुछ चाहिए...
अक्सर सोंचता हुँ मैं,

क्यूँ जी रहे हैं हम
किस मकसद के लिए
सिर्फ इस लिए की..
किसी को जरुरत है मेरी 
या फिर मुझे किसी की..?
और फिर 
जरुरत ख़त्म तो हम भी ख़त्म ?
सुना है वक़्त के साथ
हर जरुरत ख़त्म हो जाती है,
पर वक़्त के साथ
जिंदगियाँ भी ख़त्म हो जाती है
खाक हो जाती है,
उस खाक के राख में बचता क्या है ?
कुछ भी तो नही
मैं, मेरा वज़ूद, मेरा अहम्
सब ख़त्म 
पर ये सवाल तब भी जिन्दा रह जाता हैं
कि.. क्या मुझे ज़िन्दगी से
           कुछ चाहिए
या फिर ज़िन्दगी को मुझ से कुछ ?
...............@अवनीश.


आंसुओं की कभी एक बूंद ,
                    जला के देखिये,
खाड़े पानी में लफ्जों से ,
         शक्कर मिला के देखिये|

मिले फुरसत तो आईने में ,
                             आप भी,
अपनी  ही  सूरत से  कभी,
            सूरत मिला के देखिये |

इस  जिंदा  शहर  में  लहू ,
                बेरंग है सब का,
कभी  अपने  भी  सीने  पे,
            खंज़र चला के देखिये |

बंद रास्तो में भी कई  राह ,
            निकल आएँगी ...
दिल  से  कभी  आप भी ,,
             दिल मिला के देखिये |

रौशन हो उठेगी आपकी दुनिया ,
                   खुद -व- खुद ..
कभी गैरों की ज़िन्दगी के भी ,
             अंधेरें मिटा के देखिये |
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क़्या लिखूँ....

क्यां लिखूँ  ______

मै लिखुं तो अब क्या लिखुं,, के लिखने को बचा क्या है
दिल टुटा आँखे रोयीं,,  इस से ज्यादा हुआ क्या है ...!!?
संभल कर चलने वाले ही अक्सर, ठोकरों से गिरते हैं
जिंदगी की राहों में जो गिरा ही न हो,, वो संभला क्या हैं..!!?
तरपाना- रुलाना,, सब इनकी फितरत में है सामिल
इश्क की आग में कभी,, जो जला ही न हो वो बुझा क्या हैं..!!?
तू लाख बनालें मनसूबे ,, पूरी करने को अपनी  चाहते
पर इश्क पे भी ज़ोर कहीं ,, किसी का कभी चला क्या हैं..!!?
ये मंदिर ये मस्जिद है ,, बस तेरा- मेरा की ज़िद है
सरहद पे रहने वालों का , तू ही बता खुदा क्या है ..!!?
तू मिटटी है ,मिटटी का ये बदन फिर मिटटी में मिल जाना है
फिर चार पल की जिंदगी में ,, गैर क्या है अपना क्या है..!!?
ना ये मंज़िल है ना ये ठिकाना  हैं,,ये दुनिया तो एक सरायखाना है
ठोकर लगे तो  फिर उठ के चल,, बैठ के यूँ रोता क्या हैं ..!!?
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