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जीवन क्यूँ होता तार-तार ,
फूट रही क्यूँ कटु झंकार |
संस्कृति के वक्छ्स्थल पर ,
आधुनिकता का कैसा प्रहार |
मातृत्व रोती जार-जार,
लक्छ्य धूमिल, पथ अल्क्छित,
कर्म विचलित बार-बार |
रूठा शर्म, शील- लज्जा ,
रूठा जीवन का श्रृंगार |
स्वाँस-स्वाँस सब छूट रहा ,
जीवन का डोर ये टूट रहा |
क्या तेरा , क्या मेरा यहाँ ,
कैसा हैं ये अधिकार |
जीवन क्यूँ होता तार-तार ,
फूट रही क्यूँ कटु झंकार |
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