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खुलीं किताबों के पन्ने
हवाओं से फरफरा रह थी
मानो जैसे कह रही हो....
आओ..... पढ़ो मुझे..
देखो...परीक्छा सर पे है..
किताबों की उस याचक भाषा को
समझना वाकई में ईजी था...
पर सुन कर अनसुना करता रहा ..
क्यूंकि मै फेसबुक पे बीजी था..
पंखा सर पे नांच रहा था..
(शायद एंटी- क्लोक्वईज )
मै चेयर पर बैठा ....
सतत कीबोर्ड को ऊँगली करता ..
चेहरे की भाव-भंगिमा पल-प्रतिपल बदलते
चैटिंग की अलौकिक मुद्रा थी ये ..
चेहरे पर तैरते
सतत परिवर्तनशील भाव ..
कभी अधरों पे मध्यम मुस्कान ..
कभी माथे पर प्रश्नसूचक से परते बल ..
हम आनंदित हो फेसबुक का रसस्वादन करते..
और सारी दुनियाँ फेसबूक पे क्रेज़ी था..
इसलिए मै भी फेसबुक पे बीज़ी था..
कमेन्ट पढ़ने और करने में
न जाने आधा दिन गुजर गया ..
अब ऑफलाईन हू तो सोंचता हू ..
वो सब कीमती वक्त किधर गया ..
फेसबुक की वर्चुअल दुनिया से ,
निकला तो देखा ..
बाहर का मौषम वाकई सुहाना था ..
चिडिओं की चहचाहट और ,
सुहानी सरफिरी हवाओं का शोर..
सब नया नही था,, और...
यादों की ज़ेहन में परी धुल हटती गयी...
अहा...!! अथक प्रयत्नों पे
गुलामी की जंजीर अब टूटी थी ..
मै स्वतंत्र था ..
और इसे महसूस करना,
एक अत्यन्त सुखद अनुभूति थी ..
पर मुझे पता है ..
ये एक छनिक खुशी है..
ये सब एक स्वप्न मात्र है ..
मेरा मन फेसबुक की सलाखों के पीछे कैद है..
क्यूंकि मेरे कुछ खास लोग यहाँ रहते है ...
......... " अवनीश गौतम ".....
by Avnish Gautam.....Copyrite (c)
Dated- 29/03/2012
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