क्या चाहिए मुझे जिंदगी से?
या जिंदगी को मुझ से कुछ चाहिए...
अक्सर सोंचता हुँ मैं,
क्यूँ जी रहे हैं हम
किस मकसद के लिए
सिर्फ इस लिए की..
किसी को जरुरत है मेरी
या फिर मुझे किसी की..?
या जिंदगी को मुझ से कुछ चाहिए...
अक्सर सोंचता हुँ मैं,
क्यूँ जी रहे हैं हम
किस मकसद के लिए
सिर्फ इस लिए की..
किसी को जरुरत है मेरी
या फिर मुझे किसी की..?
और फिर
जरुरत ख़त्म तो हम भी ख़त्म ?
सुना है वक़्त के साथ
हर जरुरत ख़त्म हो जाती है,
पर वक़्त के साथ
जरुरत ख़त्म तो हम भी ख़त्म ?
सुना है वक़्त के साथ
हर जरुरत ख़त्म हो जाती है,
पर वक़्त के साथ
जिंदगियाँ भी ख़त्म हो जाती है
खाक हो जाती है,
उस खाक के राख में बचता क्या है ?
कुछ भी तो नही
मैं, मेरा वज़ूद, मेरा अहम्
सब ख़त्म
पर ये सवाल तब भी जिन्दा रह जाता हैं
कि.. क्या मुझे ज़िन्दगी से
कुछ चाहिए
या फिर ज़िन्दगी को मुझ से कुछ ?
...............@अवनीश.
उस खाक के राख में बचता क्या है ?
कुछ भी तो नही
मैं, मेरा वज़ूद, मेरा अहम्
सब ख़त्म
पर ये सवाल तब भी जिन्दा रह जाता हैं
कि.. क्या मुझे ज़िन्दगी से
कुछ चाहिए
या फिर ज़िन्दगी को मुझ से कुछ ?
...............@अवनीश.