Monday, 3 February 2025

जिंदगी से कुछ

क्या चाहिए मुझे जिंदगी से?
या जिंदगी को मुझ से कुछ चाहिए...
अक्सर सोंचता हुँ मैं,

क्यूँ जी रहे हैं हम
किस मकसद के लिए
सिर्फ इस लिए की..
किसी को जरुरत है मेरी 
या फिर मुझे किसी की..?
और फिर 
जरुरत ख़त्म तो हम भी ख़त्म ?
सुना है वक़्त के साथ
हर जरुरत ख़त्म हो जाती है,
पर वक़्त के साथ
जिंदगियाँ भी ख़त्म हो जाती है
खाक हो जाती है,
उस खाक के राख में बचता क्या है ?
कुछ भी तो नही
मैं, मेरा वज़ूद, मेरा अहम्
सब ख़त्म 
पर ये सवाल तब भी जिन्दा रह जाता हैं
कि.. क्या मुझे ज़िन्दगी से
           कुछ चाहिए
या फिर ज़िन्दगी को मुझ से कुछ ?
...............@अवनीश.


आंसुओं की कभी एक बूंद ,
                    जला के देखिये,
खाड़े पानी में लफ्जों से ,
         शक्कर मिला के देखिये|

मिले फुरसत तो आईने में ,
                             आप भी,
अपनी  ही  सूरत से  कभी,
            सूरत मिला के देखिये |

इस  जिंदा  शहर  में  लहू ,
                बेरंग है सब का,
कभी  अपने  भी  सीने  पे,
            खंज़र चला के देखिये |

बंद रास्तो में भी कई  राह ,
            निकल आएँगी ...
दिल  से  कभी  आप भी ,,
             दिल मिला के देखिये |

रौशन हो उठेगी आपकी दुनिया ,
                   खुद -व- खुद ..
कभी गैरों की ज़िन्दगी के भी ,
             अंधेरें मिटा के देखिये |
____

क़्या लिखूँ....

क्यां लिखूँ  ______

मै लिखुं तो अब क्या लिखुं,, के लिखने को बचा क्या है
दिल टुटा आँखे रोयीं,,  इस से ज्यादा हुआ क्या है ...!!?
संभल कर चलने वाले ही अक्सर, ठोकरों से गिरते हैं
जिंदगी की राहों में जो गिरा ही न हो,, वो संभला क्या हैं..!!?
तरपाना- रुलाना,, सब इनकी फितरत में है सामिल
इश्क की आग में कभी,, जो जला ही न हो वो बुझा क्या हैं..!!?
तू लाख बनालें मनसूबे ,, पूरी करने को अपनी  चाहते
पर इश्क पे भी ज़ोर कहीं ,, किसी का कभी चला क्या हैं..!!?
ये मंदिर ये मस्जिद है ,, बस तेरा- मेरा की ज़िद है
सरहद पे रहने वालों का , तू ही बता खुदा क्या है ..!!?
तू मिटटी है ,मिटटी का ये बदन फिर मिटटी में मिल जाना है
फिर चार पल की जिंदगी में ,, गैर क्या है अपना क्या है..!!?
ना ये मंज़िल है ना ये ठिकाना  हैं,,ये दुनिया तो एक सरायखाना है
ठोकर लगे तो  फिर उठ के चल,, बैठ के यूँ रोता क्या हैं ..!!?
___________________

Thursday, 11 December 2014

बहुत रोये है तनहा होके
बहुत सिस्के है रातों में
क्यूँ आ गये ऐ मोहब्बत
तेरी इन मीठी बातो में

मेरी आँखों के कोड़ो में
समन्दर भर दिया तूने
मेरे इस हाले दिल का बहुत
तमाशा कर दिया तूने

कोई ख्वाहिस नही की थी
न कोई ख्वाब माँगा था
तेरा बस हाथ माँगा था
मैंने अपने हाथो में
बहुत रोये है तन्हा होके
बहुत सिस्के है रातो में
क्यूँ आ गये ऐ मोहब्बत
तेरी इन मीठी बातो में
......@अवनीश
तुझसे बिछर के खुद को
          खोया नही मैंने
कौन कहता है की तन्हाई में
           रोया नहीं मैंने
वो हर लफ्ज़ जो ख़त पे
        तूने लिखें थे कभी
उन लफ्जों को अश्कों से
         भिगोया नही मैंने
कौन कहता है की तन्हायी में
           रोया नही मैंने

............ अवनीश 

Saturday, 6 December 2014


बहुत कोशिस की तुम्हे भुलाने की ,
तुम्हारे यादों से दूर जाने की ,
तेरे बिना अपनी दुनियां बसाने की |
पर ऐसा न हो पाया ,
ना मुस्करा पाया ना रो पाया ...
हथेलिओं में मेरे शायद,
तेरी लकीर नहीं थी
तुझको पाने की शायद ,
मेरी तकदीर नहीं थी |
बहुत कोशिस की हाथो में वो लकीर बनाने की,
अपने तकदीर से तेरी तकदीर को मिलाने की |
पर ऐसा ना हो पाया ,
ना मुस्करा पाया ना रो पाया ....
वो वक़्त कितने प्यारे थे ,
जो संग तुम्हारे गुजारे थे ,
वही तो जीने के सहारे थे |
बहुत कोशिस की तेरा हर ख़त जलाने की ,
तेरी हर निशानियाँ दिल से मिटाने की |
पर ऐसा कहाँ हो पाया ,
ना मुस्कुरा पाया ना रो पाया ....
"@avii "

Sunday, 23 November 2014

ज़िन्दगी है, सफर है, तन्हाई है,
मंज़िल है भी या सिर्फ रूश्वाई है।
पलके है,कुछ ख्वाब है, आंशु है
दर्द ने भी बड़ी लम्बी ऊम्र पायी है।
@ अवनीश.