Thursday, 26 February 2026

सब पेड़ है।

सुकून से लेटे हुए,
पेड़ की घनी छाँव में,
पक्षियों को देखते हुए...
अचानक वो पल याद आया।
​जब पूछा था मैंने यह सवाल,
"ये किसका पौधा है?
क्या इसे प्यास लगी है?"
जब पिता एक नन्हे पौधे को,
पानी दे रहे थे।

​उनका दार्शनिक सा वो जवाब,
आज बहुत प्रासंगिक लगता है...
"ये छाया का पेड़ है,
इस पर चिड़ियाँ उगेंगी।
और अपना ये बगीचा चहचहाएगा...
मैं बूढ़ा होऊंगा, और ये बड़ा हो जाएगा।"

​बात मात्र एक पौधे की नहीं,
कविता मात्र उसके पेड़ बनने की नहीं,
बात मात्र पेड़ की नहीं...
हमारे सपनों की भी है।
हमारी ख्वाहिशों, हमारी उम्मीदों की है,
हमारे रिश्ते-नाते,
उनकी खुशियाँ...
सबको सींचते रहना पड़ता है,
"सब पेड़ हैं।"
आज हवाओं के संग,
ये पेड़ कानों में फुसफुसा कर,
मानो कह रहा है...
"मेहनत बरकत लाती है,
..बेकार नहीं जाती मेहनत।"
सब सींचते रहना परता है 
"सब पेड़ है "

✍️अवनीश...

Wednesday, 23 April 2025

फेसबुक और एग्जाम

.... मेरी कविता ......
_________________
खुलीं किताबों के पन्ने 
हवाओं से फरफरा रह थी 
मानो जैसे कह रही हो....
आओ..... पढ़ो मुझे..
देखो...परीक्छा सर पे है..
किताबों की उस याचक भाषा को 
समझना वाकई में ईजी था...
पर सुन कर अनसुना करता रहा ..
क्यूंकि मै फेसबुक पे बीजी था..

पंखा सर पे नांच रहा था..
(शायद एंटी- क्लोक्वईज )
मै चेयर पर बैठा ....
सतत कीबोर्ड को ऊँगली करता ..
चेहरे की भाव-भंगिमा पल-प्रतिपल बदलते
चैटिंग की अलौकिक मुद्रा थी ये ..
चेहरे पर तैरते 
सतत परिवर्तनशील भाव ..
कभी अधरों पे मध्यम मुस्कान ..
कभी माथे पर प्रश्नसूचक से परते बल ..
हम आनंदित हो फेसबुक का रसस्वादन करते..
और सारी दुनियाँ फेसबूक पे क्रेज़ी था..
इसलिए मै भी फेसबुक पे बीज़ी था..

कमेन्ट पढ़ने और करने में
न जाने आधा दिन गुजर गया ..
अब ऑफलाईन हू तो सोंचता हू ..
वो सब कीमती वक्त किधर गया ..
फेसबुक की वर्चुअल दुनिया से ,
निकला तो देखा ..
बाहर का मौषम वाकई सुहाना था ..
चिडिओं की चहचाहट और ,
सुहानी सरफिरी हवाओं का शोर..
सब नया नही था,, और...
यादों की ज़ेहन में परी धुल हटती गयी...
अहा...!! अथक प्रयत्नों पे 
गुलामी की जंजीर अब टूटी थी ..
मै स्वतंत्र था ..
और इसे महसूस करना,
एक अत्यन्त सुखद अनुभूति थी ..

पर मुझे पता है ..
ये एक छनिक खुशी है..
ये सब एक स्वप्न मात्र है ..
मेरा मन फेसबुक की सलाखों के पीछे कैद है..
क्यूंकि मेरे कुछ खास लोग यहाँ रहते है ...

......... " अवनीश गौतम ".....
by Avnish Gautam.....Copyrite (c)
Dated- 29/03/2012
____________x_____________

Tuesday, 4 February 2025

..इस  दौड़ में..

अजब ये रवायत  चली है इस दौड़ में ..
के रश्मे बेमुरव्वत चली है इस दौड़ में  |
शबनम भी अब तिश्नगी में जलते हैं..
अज़ब ये मोहब्बत चली है इस दौड़ में |
तोरते देखा है खुदा की बनायीं रश्मों को ..
के खुदा से भी रकावत चली है इस दौड़ में |
आदमी, आदमी का दुश्मन बना बैठा है ..
ये  कैसी  नफ़रत  चली  है  इस  दौड़  में |
खुदा बनने की खुद चाह किये बैठे  है सब  ..
अपनी-अपनी सब की कुवत चली है इस दौड़ में |
हो चला है अब हर मज़हब खून से लाल यहाँ ..
ये किस खुदा की इबादत चली है इस दौड़ में |

Monday, 3 February 2025

जिंदगी से कुछ

क्या चाहिए मुझे जिंदगी से?
या जिंदगी को मुझ से कुछ चाहिए...
अक्सर सोंचता हुँ मैं,

क्यूँ जी रहे हैं हम
किस मकसद के लिए
सिर्फ इस लिए की..
किसी को जरुरत है मेरी 
या फिर मुझे किसी की..?
और फिर 
जरुरत ख़त्म तो हम भी ख़त्म ?
सुना है वक़्त के साथ
हर जरुरत ख़त्म हो जाती है,
पर वक़्त के साथ
जिंदगियाँ भी ख़त्म हो जाती है
खाक हो जाती है,
उस खाक के राख में बचता क्या है ?
कुछ भी तो नही
मैं, मेरा वज़ूद, मेरा अहम्
सब ख़त्म 
पर ये सवाल तब भी जिन्दा रह जाता हैं
कि.. क्या मुझे ज़िन्दगी से
           कुछ चाहिए
या फिर ज़िन्दगी को मुझ से कुछ ?
...............@अवनीश.


आंसुओं की कभी एक बूंद ,
                    जला के देखिये,
खाड़े पानी में लफ्जों से ,
         शक्कर मिला के देखिये|

मिले फुरसत तो आईने में ,
                             आप भी,
अपनी  ही  सूरत से  कभी,
            सूरत मिला के देखिये |

इस  जिंदा  शहर  में  लहू ,
                बेरंग है सब का,
कभी  अपने  भी  सीने  पे,
            खंज़र चला के देखिये |

बंद रास्तो में भी कई  राह ,
            निकल आएँगी ...
दिल  से  कभी  आप भी ,,
             दिल मिला के देखिये |

रौशन हो उठेगी आपकी दुनिया ,
                   खुद -व- खुद ..
कभी गैरों की ज़िन्दगी के भी ,
             अंधेरें मिटा के देखिये |
____

क़्या लिखूँ....

क्यां लिखूँ  ______

मै लिखुं तो अब क्या लिखुं,, के लिखने को बचा क्या है
दिल टुटा आँखे रोयीं,,  इस से ज्यादा हुआ क्या है ...!!?
संभल कर चलने वाले ही अक्सर, ठोकरों से गिरते हैं
जिंदगी की राहों में जो गिरा ही न हो,, वो संभला क्या हैं..!!?
तरपाना- रुलाना,, सब इनकी फितरत में है सामिल
इश्क की आग में कभी,, जो जला ही न हो वो बुझा क्या हैं..!!?
तू लाख बनालें मनसूबे ,, पूरी करने को अपनी  चाहते
पर इश्क पे भी ज़ोर कहीं ,, किसी का कभी चला क्या हैं..!!?
ये मंदिर ये मस्जिद है ,, बस तेरा- मेरा की ज़िद है
सरहद पे रहने वालों का , तू ही बता खुदा क्या है ..!!?
तू मिटटी है ,मिटटी का ये बदन फिर मिटटी में मिल जाना है
फिर चार पल की जिंदगी में ,, गैर क्या है अपना क्या है..!!?
ना ये मंज़िल है ना ये ठिकाना  हैं,,ये दुनिया तो एक सरायखाना है
ठोकर लगे तो  फिर उठ के चल,, बैठ के यूँ रोता क्या हैं ..!!?
___________________

Thursday, 11 December 2014

बहुत रोये है तनहा होके
बहुत सिस्के है रातों में
क्यूँ आ गये ऐ मोहब्बत
तेरी इन मीठी बातो में

मेरी आँखों के कोड़ो में
समन्दर भर दिया तूने
मेरे इस हाले दिल का बहुत
तमाशा कर दिया तूने

कोई ख्वाहिस नही की थी
न कोई ख्वाब माँगा था
तेरा बस हाथ माँगा था
मैंने अपने हाथो में
बहुत रोये है तन्हा होके
बहुत सिस्के है रातो में
क्यूँ आ गये ऐ मोहब्बत
तेरी इन मीठी बातो में
......@अवनीश
तुझसे बिछर के खुद को
          खोया नही मैंने
कौन कहता है की तन्हाई में
           रोया नहीं मैंने
वो हर लफ्ज़ जो ख़त पे
        तूने लिखें थे कभी
उन लफ्जों को अश्कों से
         भिगोया नही मैंने
कौन कहता है की तन्हायी में
           रोया नही मैंने

............ अवनीश 

Saturday, 6 December 2014


बहुत कोशिस की तुम्हे भुलाने की ,
तुम्हारे यादों से दूर जाने की ,
तेरे बिना अपनी दुनियां बसाने की |
पर ऐसा न हो पाया ,
ना मुस्करा पाया ना रो पाया ...
हथेलिओं में मेरे शायद,
तेरी लकीर नहीं थी
तुझको पाने की शायद ,
मेरी तकदीर नहीं थी |
बहुत कोशिस की हाथो में वो लकीर बनाने की,
अपने तकदीर से तेरी तकदीर को मिलाने की |
पर ऐसा ना हो पाया ,
ना मुस्करा पाया ना रो पाया ....
वो वक़्त कितने प्यारे थे ,
जो संग तुम्हारे गुजारे थे ,
वही तो जीने के सहारे थे |
बहुत कोशिस की तेरा हर ख़त जलाने की ,
तेरी हर निशानियाँ दिल से मिटाने की |
पर ऐसा कहाँ हो पाया ,
ना मुस्कुरा पाया ना रो पाया ....
"@avii "

Sunday, 23 November 2014

ज़िन्दगी है, सफर है, तन्हाई है,
मंज़िल है भी या सिर्फ रूश्वाई है।
पलके है,कुछ ख्वाब है, आंशु है
दर्द ने भी बड़ी लम्बी ऊम्र पायी है।
@ अवनीश.

Monday, 23 September 2013

मेरी आँखों को या तो समंदर कर दे..
या मेरा दिल..... ए ख़ुदा तू पत्थर कर दे.।
मुझको मेरी शर्तों पे अब तो जीने दे.…
या मेरी मौत की तारीख ही मुक़र्रर कर दे।
न खिलें फूल गुंचा-ए- गुल वीरान रहे ….
मेरी हसरतों को पनप ने दे या बंज़र कर दे।


के हर बरस क्यूँ करें कुछ मौषमों का इंतेज़ार ….
इन ख्वाहिशों को फिज़ा या पतझर कर दे।
मेरी आँखों को या तो समंदर कर दे..
या मेरा दिल..... ए ख़ुदा तू पत्थर कर दे.।

@ ... अवनीश 

Monday, 11 February 2013

♥•♥´¨`♥•.¸¸.•♥´¨`♥•♥´♥•♥ 
Happy Valentine Day

इन आँखों से तुम्ही कहो
अश्क क्यूँ न बहे.......
हिज़्र के इन लम्हों को
तुम्ही कहो कैसे सहे.....!

इतनी नासमझ भी तो
नहीं हो मेरी जान तुम..!!
फिर कहें भी तुम्हे तो
आखिर क्या कहें....
के तुम्हारी मोहब्बत से,
रौशन है ज़िन्दगी मेरी..
फिर तुम्हारे बगैर
तुम्ही बताओ हम कैसे रहे..
ये  दूरीयां अब  इतनी
अच्छी नही
हो जाओ आज करीब,
बहुत करीब इस दिल के ..
आजाओ आज तो कम से कम
मेरी बाँहों में....
कहना है आज दिल से तुम्हे,
Happy Valentine Day

ये हवाँ सुने, ये फ़ज़ा सुने..
सुने ये चाँद तारे .........
कहना है आज दिल से तुम्हे,
Happy Valentine Day
♥•♥´¨`♥•.¸¸.•♥´¨`♥•♥´♥•♥ 




Wednesday, 2 January 2013


जब मैं उस से मिला तो मुझे नही पता था ,
के वो हमारी.....
आखिरी मुलाकात थी |
उस आखिरी मुलाकात में ,,
जाते हुए आखिरी बार ,
..उसने यही कहा ,,
उसने कहा की.............,

मुझे भुला देना ,
शाख पे खिले सब
... फूल गिरा देना |
जो ख़त लिखे हैं ,
कभी प्यार में तुमको...
जाकर सब अपने हाथों से ,
.......जला देना ||

मैं किसी और की ,
अब होने चलीं ..
तुम भी दिल से अब ,
...मेरी यादों को मिटा देना |
मुझसे मिलने की अब ,
न कोई कोसीस करना...
हो सके तो तुम भी ,
अपनी दुनियां बसा लेना ||

हमने कहा की  ....
हमने तो तेरी यादों से ही ,
अपनी दुनिया बसा लीं हैं....
हर मुस्कराहट में अपने ,
हज़ारों गम छुपा लीं है |
बहुत कोसीस की पर ,
मर भी तो नही पाया...
ना जाने कितनो से आखिर ,
मैंने जीने की दुआं लीं है ||
पर गैरों के साथ तुमकों,,
तुम्हारी ज़िन्दगी मुबारक..
हमने तो अपने मौत की ,,
..........बरसीं भी मना लीं है

________@ अवनीश गौतम "





Friday, 7 December 2012

कोई तो आए, आकर कुछ
                    तन्हाई तो बांटे
के हम किस खंज़र किस तलवार से,
                   इस रात को काटे

Wednesday, 15 August 2012


देश क्यूँ आज़ाद हुआ..?
गाँधी जी ने देश को क्यूँ आज़ाद कराया ..
क्या सिर्फ इस लिए की नया नोट चलाएँगे
और उसपे अपनी फोटो लगाएँगे..
-
देश क्यूँ आज़ाद हुआ..?
क्या नेताओं ने मिलके देश को इसलिए आज़ाद कराया..
के अपनी सरकार चलाएँगे..!!
और सारा पैसा स्वीस बैंक में जमा कराएँगे ..!!
आश्वासनों से गरीबों की पेट भरेंगे..!!
और वोट बैंक की राजनीति कर ,, हम मौज करेंगे..!!
-
कही आतंकवाद ,, कहीं माओवाद
अब किस से करे यहाँ फरियाद
क्यूँ सहमे डरे से लोग यहाँ
और जीने की लाचारी
भूख - गरीबी और बेरोजगारी
उसपे ये भ्रस्टाचारी

छोड़ो...हमलोगों को क्या लेना..
हम क्यूँ इस सवालों में उलझे ..!!
अपने पास और भी काम हैं ..

चलो  झंडा फहराते हैं
और राष्ट्रगान गाते हैं ..
 ..:-)

....................अवनीश गौतम

Friday, 10 August 2012


...... बचपन ......

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सोंचता हूँ जब भी,
गुजरे वक्त को
दिल में एक टीस से उठती हैं
और छलक परता हैं,
आँखों से वही नमकीन सा पानी
जो  सूखता है तो
गालो पे दाग सा रह जाता है,
लकीर बन के....

सोंचता हूँ जब भी,
गुजरे वक्त को....
लबों पे एक आह से उठती है..
वो वक्त कितना सुहाना था...
वेफिक्र से हम जिन्हें
जी गए.......
चोट लगने पर
खुल के रो लिया तो करते थे..
बहते आंसुओं को, माँ की आँचल से
पोंछ लिया करते थे..
किसे परवाह थी,
खोने की, पाने की
जो मिल गया उसी में खुश हो जाते
और जो न मिला
उस का गम भी न था....

सोंचता हूँ जब भी,
गुजरे वक्त को..
वेफिक्र से जिन्हें जी गए..
क्यू जी भर के जिया नही........??
.........by avnish gautam

दिल चाहे ,जब चाहे,
जो चाहे करना..
पर ये दुनिया है यारो,
इसपे भरोसा मत करना...
फिर झूठे ख्वाब सजायेंगे,
फिर झूठी आस दिलाएंगे...
फिर दिल को दिलाशा देकर 
इस दिल को समझाएंगे,
के चाहत में किसी के ना,
हद से गुजरना ...
ये दुनियाँ है यारो,
इसपे भरोसा मत करना 

हुआ दूर अँधियारा
टूटा मृगतृष्ण
हो रहा जग सारा
......कृष्ण-कृष्ण
मुझमे कृष्ण
तुझमे कृष्ण
सत्-चित्-आनंद
.......कृष्ण-कृष्ण

Tuesday, 24 July 2012

      .......♥•♥´¨`♥•.¸¸.•♥´¨`♥•♥........

ज़िन्दगी यूँ न बस साँसों की रवानी होती
तू होती तो एक अच्छी  सी कहानी होती
ख्वाब होते , ख्वाहिशे होती ,
............................यादों की निशानी होती
तू होती तो एक अच्छी सी कहानी होती
छेड़ कर किस्सा , फिर अपनी यादों का ,
बातें कुछ नई , तो कुछ पुरानी होती
शाम-ऐ -तन्हाई  में संग,
......................... कुछ वक्त बितानी होती ,
कुछ तुमको कहनी होती, कुछ हमको सुनानी होती
होता अपना भी ख्वाबो का आशियाना कहीं ,
प्यार के वादों से अपनी दुनियां सजानी होती
तू होती तो एक अच्छी  सी कहानी होती
       
      .......♥•♥´¨`♥•.¸¸.•♥´¨`♥•♥........    
                 ♥╬ Avnish ╬♥

Thursday, 12 July 2012

जब भी मिलता है मुझे,
वो नया सा लगता है
उसके चेहरे पे हर बार एक,
नया  चेहरा सा लगता है
वो मिलता है, हँसता है,
बातें करता है ....
पर जाने क्यूँ  ये सब कुछ
अब झूठा सा लगता है