पेड़ की घनी छाँव में,
पक्षियों को देखते हुए...
अचानक वो पल याद आया।
जब पूछा था मैंने यह सवाल,
"ये किसका पौधा है?
क्या इसे प्यास लगी है?"
जब पिता एक नन्हे पौधे को,
पानी दे रहे थे।
उनका दार्शनिक सा वो जवाब,
आज बहुत प्रासंगिक लगता है...
"ये छाया का पेड़ है,
इस पर चिड़ियाँ उगेंगी।
और अपना ये बगीचा चहचहाएगा...
मैं बूढ़ा होऊंगा, और ये बड़ा हो जाएगा।"
बात मात्र एक पौधे की नहीं,
कविता मात्र उसके पेड़ बनने की नहीं,
बात मात्र पेड़ की नहीं...
हमारे सपनों की भी है।
हमारी ख्वाहिशों, हमारी उम्मीदों की है,
हमारे रिश्ते-नाते,
उनकी खुशियाँ...
सबको सींचते रहना पड़ता है,
"सब पेड़ हैं।"
आज हवाओं के संग,
ये पेड़ कानों में फुसफुसा कर,
मानो कह रहा है...
"मेहनत बरकत लाती है,
..बेकार नहीं जाती मेहनत।"
सब सींचते रहना परता है
"सब पेड़ है "
✍️अवनीश...
